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रमज़ान का महत्व और गुण
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रमज़ान, रोज़ा, तक़वा, क़ुरान
अर्धचंद्र आकाश

रमज़ान इस्लामी कैलेंडर का नौवां महीना है और दुनिया भर के मुसलमानों के लिए यह साल का सबसे पवित्र, मुबारक और गौरवशाली महीना है। यह सिर्फ़ भूखे-प्यासे रहने का महीना नहीं है, बल्कि यह आध्यात्मिक शुद्धि, आत्म-सुधार, संयम, धैर्य और अल्लाह का क़ुर्ब (निकटता) हासिल करने का एक गहरा और अनमोल अवसर है। इस महीने में मुसलमान 'सौम' यानी रोज़ा रखते हैं, जो इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है। रमज़ान को रहमत (अल्लाह की दया), मग़फ़िरत (क्षमा) और नजात (नरक से मुक्ति) के तीन अशरों (हिस्सों) में बांटा गया है, जो इसकी असीम महानता को दर्शाता है।

रमज़ान का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

रमज़ान का सबसे बड़ा महत्व यह है कि इसी मुबारक महीने में मानवता के मार्गदर्शन के लिए अंतिम और सबसे पवित्र किताब, क़ुरान मजीद, का अवतरण शुरू हुआ। अल्लाह तआला फ़रमाता है:

"रमज़ान का महीना वह है, जिसमें क़ुरान उतारा गया, जो लोगों के लिए हिदायत है और जिसमें हिदायत के और हक़ और बातिल में फ़र्क़ करने के वाज़ेह दलाइल हैं।" (सूरह अल-बक़रा, 2:185)

इसी महीने में 'लैलतुल क़द्र' या क़द्र की रात आती है, जो हज़ार महीनों से भी बेहतर है। अल्लाह तआला इस रात की शान में फ़रमाता है, "हमने इसे (क़ुरान को) क़द्र की रात में उतारा। और तुम क्या जानो कि क़द्र की रात क्या है? क़द्र की रात हज़ार महीनों से बेहतर है।" (सूरह अल-क़द्र, 97:1-3)। इस एक रात की इबादत 83 साल से ज़्यादा की इबादत के बराबर सवाब रखती है, जो रमज़ान की फ़ज़ीलत को और भी बढ़ा देती है।

रोज़े का असल मक़सद: तक़वा हासिल करना

रोज़े का मूल उद्देश्य 'तक़वा' या अल्लाह का डर और परहेज़गारी हासिल करना है। तक़वा का मतलब है अल्लाह के डर और उसकी खुशी के लिए हर तरह के गुनाहों और बुरे कामों से खुद को बचाना। दिन भर खाने, पीने, शारीरिक इच्छाओं और फ़ालतू बातों से दूर रहकर एक मुसलमान अपनी नफ़्स (आत्मा) पर क़ाबू पाना सीखता है और अल्लाह के प्रति अपनी फ़रमाबरदारी और मुहब्बत का इम्तिहान देता है।

रोज़े के बहुत से फायदे हैं, जो आध्यात्मिक, शारीरिक, मानसिक और सामाजिक हर पहलू पर असर डालते हैं।

  • आध्यात्मिक उन्नति: रोज़ा अल्लाह की तरफ ध्यान बढ़ाता है, इबादत में गहराई और एकाग्रता लाता है। इस महीने में शैतानों को क़ैद कर दिया जाता है, जिससे इबादत करना और गुनाहों से बचना आसान हो जाता है।
  • आत्म-नियंत्रण और धैर्य: रोज़ा धैर्य, संयम और इच्छा-शक्ति को मजबूत करता है। यह एक इंसान को सिखाता है कि कैसे अपनी भावनाओं और इच्छाओं को नियंत्रित किया जाए।
  • सहानुभूति और हमदर्दी: अमीर-गरीब सभी मुसलमान रोज़ा रखकर भूख की तकलीफ़ को महसूस करते हैं। इससे उनके दिलों में गरीबों और ज़रूरतमंदों के लिए हमदर्दी पैदा होती है, जो उन्हें दान-पुण्य करने के लिए प्रेरित करती है।
  • शारीरिक स्वास्थ्य: आधुनिक विज्ञान ने भी साबित किया है कि नियंत्रित उपवास (Intermittent Fasting) सेहत के लिए बहुत फ़ायदेमंद है। यह शरीर को डिटॉक्स करता है, पाचन तंत्र को आराम देता है, और कई बीमारियों से बचाता है।

रमज़ान में करने वाले ख़ास आमाल

रमज़ान इबादतों का मौसम-ए-बहार है। इस महीने में फ़र्ज़ इबादतों के साथ-साथ नफ़्ल (स्वैच्छिक) इबादतों का सवाब भी कई गुना बढ़ा दिया जाता है।

  1. क़ुरान की तिलावत और अध्ययन: चूँकि यह क़ुरान का महीना है, इसलिए इस महीने में ज़्यादा से ज़्यादा क़ुरान पढ़ना, उसका मतलब समझना और उस पर अमल करना बहुत सवाब का काम है।
  2. तरावीह की नमाज़: इशा की नमाज़ के बाद तरावीह की नमाज़ पढ़ना रमज़ान की एक अहम सुन्नत है। जमात के साथ तरावीह पढ़ना रमज़ान की रातों की रौनक़ है।
  3. दान-पुण्य (सदक़ा): पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) रमज़ान में सबसे ज़्यादा सख़ी हो जाते थे। इस महीने में दान करने का सवाब बहुत ज़्यादा है।
  4. एतिकाफ़: रमज़ान के आख़िरी दस दिनों में दुनिया के कामों से अलग होकर मस्जिद में सिर्फ़ अल्लाह की इबादत के लिए बैठना 'एतिकाफ़' कहलाता है। यह एक बहुत फ़ज़ीलत वाली सुन्नत है, जिससे लैलतुल क़द्र पाने में आसानी होती है।
  5. दुआ और इस्तिग़फ़ार: रमज़ान दुआओं की क़बूलियत का महीना है। ख़ास तौर पर इफ़्तार, सहरी और रात के आख़िरी पहर में अल्लाह से अपनी ज़रूरतों, गुनाहों की माफ़ी और भलाई के लिए दुआ करनी चाहिए।
  6. लैलतुल क़द्र की तलाश: रमज़ान के आख़िरी दस दिनों की विषम रातों (21, 23, 25, 27, 29) में लैलतुल क़द्र को तलाश करना चाहिए और इन रातों में जागकर इबादत करनी चाहिए।
  7. ज़कातुल फ़ित्र: ईद की नमाज़ से पहले हर साहिब-ए-निसाब मुसलमान की तरफ़ से गरीबों के लिए एक নির্দিষ্ট मात्रा में अनाज या उसकी क़ीमत अदा करना वाजिब है, जिसे 'ज़कातुल फ़ित्र' या 'फ़ितरा' कहते हैं। यह रोज़ों की कमियों को दूर करता है और गरीबों को ईद की खुशियों में शामिल करता है।

रमज़ान से हमें क्या सीखना चाहिए?

रमज़ान का महीना मुसलमानों के लिए एक ट्रेनिंग का महीना है। इस एक महीने में हासिल किया गया तक़वा, धैर्य, और आत्म-नियंत्रण अगर बाकी ग्यारह महीनों तक बनाए रखा जाए, तो रमज़ान का असली मक़सद पूरा होगा। रमज़ान हमें सिखाता है कि कैसे बुरी इच्छाओं को दबाकर अल्लाह की फ़रमाबरदारी वाली ज़िंदगी गुज़ारी जाए। यह हमें एक बेहतर इंसान और एक बेहतर मुसलमान बनने में मदद करता है।

निष्कर्ष

रमज़ान सिर्फ़ एक महीने का धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि यह एक जीवन बदलने वाला अनुभव है जो हमारी आत्मा को पवित्र करता है और हमें अल्लाह के क़रीब ले जाता है। इस महीने का हर पल बहुत क़ीमती है। इसलिए हमें इस महीने के हर मौक़े का फ़ायदा उठाकर दुनिया और आख़िरत की कामयाबी हासिल करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। अल्लाह हम सबको रमज़ान के महत्व और गुणों को समझने और उसके मुताबिक़ अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।