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इस्लाम में सब्र का महत्व
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ईमान, जीवनशैली, क़ुरान, धैर्य
कलम

सब्र, या धैर्य, इस्लाम में सबसे मौलिक और महत्वपूर्ण गुणों में से एक है। यह एक मुसलमान के ईमान (आस्था) और चरित्र की आधारशिला है, जिसका उल्लेख क़ुरान और पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) की शिक्षाओं (हदीस) में 90 से अधिक बार किया गया है। सब्र का मतलब सिर्फ़ चुपचाप दुख सहना नहीं है, बल्कि यह मुश्किल समय में भी अल्लाह पर भरोसा बनाए रखना, सही रास्ते पर टिके रहना और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाना है।

क़ुरान का दृष्टिकोण: सब्र करने वालों के साथ अल्लाह है

क़ुरान बार-बार धैर्य से जुड़े पुरस्कारों और गुणों पर ज़ोर देता है। अल्लाह (SWT) स्पष्ट रूप से कहता है कि वह धैर्य रखने वालों के साथ है, जो एक मोमिन के लिए सबसे बड़ा आश्वासन है।

"ऐ ईमान वालो! सब्र और नमाज़ के द्वारा मदद माँगो। बेशक, अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।" (क़ुरान 2:153)

अल्लाह का साथ होने का मतलब है कि वह उन्हें समर्थन, मार्गदर्शन और अंततः सफलता प्रदान करेगा। सब्र को ईमान का आधा हिस्सा कहा गया है, जो इसके महत्व को और भी उजागर करता है।

सब्र के प्रकार: जीवन के हर पहलू में धैर्य

इस्लामी विद्वानों ने सब्र को मुख्य रूप से तीन प्रकारों में बांटा है, जो एक मुसलमान के जीवन के सभी पहलुओं को कवर करते हैं:

  1. अल्लाह की इताअत (आज्ञाकारिता) पर सब्र: इसका मतलब है अल्लाह के आदेशों का पालन करने में दृढ़ रहना। जैसे, नियमित रूप से नमाज़ पढ़ना, रमज़ान के रोज़े रखना, और ज़कात देना, भले ही यह मुश्किल लगे या मन में सुस्ती आए। इबादत में निरंतरता के लिए धैर्य की आवश्यकता होती है।
  2. अल्लाह की मनाही (हराम) से बचने पर सब्र: यह वह धैर्य है जो गुनाहों और प्रलोभनों से बचने के लिए आवश्यक है। यह अपनी इच्छाओं (नफ़्स) और शैतान के बहकावे के खिलाफ एक निरंतर संघर्ष है। आज के समाज में जहाँ बुराई आम है, इस प्रकार का सब्र बहुत महत्वपूर्ण है।
  3. अल्लाह की तरफ़ से आई मुश्किलों और आज़माइशों पर सब्र: इसमें बीमारी, धन की हानि, किसी प्रियजन की मृत्यु या किसी भी प्रकार की तकलीफ़ जैसी परीक्षाओं को अल्लाह का फैसला मानकर बिना शिकायत किए सहन करना शामिल है। इसका मतलब यह नहीं है कि इंसान दुखी नहीं हो सकता, बल्कि इसका मतलब है कि दुख में भी वह अल्लाह से नाउम्मीद न हो और अपनी आस्था न खोए।

सब्र का इनाम: बिना हिसाब के अज्र

सब्र का इनाम बहुत बड़ा और बिना हिसाब के है। जबकि कई अच्छे कामों का इनाम নির্দিষ্ট है, अल्लाह सब्र के इनाम को "बगैर हिसाब" के रूप में वर्णित करता है।

"...बेशक, सब्र करने वालों को उनका अज्र (प्रतिफल) बिना हिसाब के दिया जाएगा।" (क़ुरान 39:10)

यह दर्शाता है कि इनाम इतना विशाल और उदार है कि उसे गिना नहीं जा सकता। सब्र जन्नत की कुंजी है। पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) ने कहा: "अल्लाह जब किसी क़ौम से मुहब्बत करता है, तो उन्हें आज़माता है। जो कोई (उस आज़माइश पर) राज़ी रहा, तो उसके लिए (अल्लाह की) रज़ा है, और जो कोई नाराज़ हुआ, तो उसके लिए नाराज़गी है।" (तिर्मिज़ी)

इसका मतलब है कि मुश्किलें अल्लाह की मुहब्बत की निशानी हो सकती हैं, और उन पर सब्र करना अल्लाह की खुशी का कारण बनता है।

सब्र कैसे हासिल करें?

सब्र एक ऐसा गुण है जिसे विकसित किया जा सकता है। यहाँ कुछ तरीक़े दिए गए हैं:

  • अल्लाह की क़ुदरत और हिकमत को याद करना: यह समझना कि हर चीज़ अल्लाह के नियंत्रण में है और उसकी हर योजना में कोई न कोई भलाई छिपी होती है, भले ही हम उसे तुरंत न समझ पाएं।
  • दुआ करना: अल्लाह से सब्र और दृढ़ता के लिए दुआ मांगना।
  • नबियों की कहानियों पर विचार करना: क़ुरान में अंबिया (पैगंबरों) की कहानियाँ सब्र के बेहतरीन उदाहरणों से भरी हैं, जैसे हज़रत अय्यूब (अलैहिस्सलाम) की बीमारी पर सब्र, हज़रत यूसुफ़ (अलैहिस्सalam) का भाइयों के धोखे और क़ैद पर सब्र, और हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) का मक्का वालों के ज़ुल्म पर सब्र।
  • रोज़ा रखना: रोज़ा रखने से इंसान को अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने और धैर्य रखने का प्रशिक्षण मिलता है।

निष्कर्ष

सब्र हार मानने की एक निष्क्रिय अवस्था नहीं है; बल्कि यह इबादत का एक सक्रिय, सचेत और साहसी रूप है। यह अच्छाई करते रहने, बुराई से बचने और अटूट विश्वास के साथ जीवन की चुनौतियों का सामना करने की शक्ति है। सब्र को अपनाकर, एक मोमिन न केवल इस दुनिया की कठिनाइयों को गरिमा के साथ पार करता है, बल्कि आख़िरत (परलोक) में एक अथाह इनाम भी सुनिश्चित करता है। यह एक मुसलमान के चरित्र को सुंदर बनाता है और उसे अल्लाह के क़रीब ले जाता है।